#Kavita by Arun Kumar Arya

सद्गुण

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सद्गुण सदा से ज्ञान कहलाता आया

सद्गुणों का करो निरन्तर विकास

समाप्त हुआ जिस दिन यह सद्गुण

समझो हुआ जग से  मनुजता का नाश

 

विकास में इसके दार्शनिक सुकरात

ज़हर का प्याला पी हो गया वह अमर

दयानंद ने जब इसका बिगुल बजाया

अपनों ने ही दिया बार बार उसे जहर

 

सद्गुण रहता आया सदा से अमर

अमरता है उसकी असली पहचान

मूर्ख भी बन जाता अपनाकर  इसे

कालिदास जैसा संस्कृत कवि महान

 

कबीर,रहीम, तुलसी गाए गाथा इसकी

मानस है इसका अनुपम ग्रन्थ महान

निशि दिन करते चर्चा उसकी सर्वत्र

पढ़ उसे हुए कितने ज्ञानी संत महान

 

रीतिकाल में खो गया यह कवियों से

कविगण हुए इससे बिल्कुल अज्ञान

नारी के नख सिख का वर्णन करने में

नहीं दिए वे सद्गुणों पर तनिक ध्यान

 

आया वह काल समाज सुधारकों का

राजाराम मोहन राय केशव,अल्काट

सर सैयद अहमद ख़ान,गोविंद रानाडे,

वेदों वाला था दयानंद सरस्वती विराट

 

देशप्रेम और सद्गुण फिर चमक उठे

भारतेन्दु,द्विवेदी,माखन लाल,त्रिपाठी

प्रेमचन्द, रत्नाकर,  निराला, महादेवी

हरिऔध,प्रसाद ,गुप्त से महकी माटी

 

चलचला सिलसिला सद्गुण गाथा का

सद्गुण साहित्य में फिर से दमका उठा

आर्य” सद्गुण पाना जीवन का लक्ष्य

सद्गुण है अमर जो आज तक न मिटा

 

अरुण कुमार” आर्य ”

प्रधान

आर्य माज मन्दिर  ,मुग़ल सराय चन्दौली

 

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