#Kavita by Arun Kumar Arya

समाजवाद का ढींढोरा

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समाजवाद की चर्चा करते नेता सब

गला फाड़ कहते वह जय समाजवाद

समाज उनका कहाँ गरीबों के बीच

अट्टहास कर रहा उनमें व्यक्तिवाद

 

दम तोड़ दिया है रूस का साम्यवाद

समाजवाद बस नेताओं की जुबानी है

घर के सारे लोग आ गये राजनीति में

उनके समाजवाद की यही कहानी है

 

शारीरिक विकास करे सब अपना

आत्म विकास का करें पहले चिन्तन

बिना आत्म विकास के सम्भव नहीं है

कर रहा दुनिया समक्ष आर्य यह प्रण

 

देखो समाजवाद का घिनौना चेहरा

जंगल,गाँव,शहर के बीच बाजारों में

कोई भूखा भूख मिटाने को घूम रहा

कोई धन लुटा रहा है अपने यारों में

 

किसी का जूठन बिखर गया कूड़ा बन

कोई पाने को उसे कुत्तों से करता संघर्ष

समाजवाद की चर्चा करते बैठ ए सी में

ऐसे समाजवाद पर विषाद करें या हर्ष

 

तपती दोपहरिया, जाड़े की ठण्डी रात

झेला नहीं जिसने भादों की बरसात

आता जब चुनाव का निकट समय

ग़रीबों संग बैठ खाते सब्ज़ी,दाल भात

 

पूँजीवाद का जाल फैला दिखता सर्वत्र

कर रहे हैं सब अपने पूँजी का विकास

लूट भर रहे झोली  जनता के धन से

नित्य प्रति हो रहा नैतिकता का ह्रास

 

“त्यक्तेन भुञ्जिथा” गाया  यजुर्वेद ने

त्यागवाद रहा भारत की अनुपम देन

त्याग से अमर हुए दधिचि, कर्ण, हर्ष

कहने को रहा अब येन केन प्रकारेण

 

समाजवाद का डंका पीटने वाले जन

कर रहे व्यक्ति विशेष का जय जयकार

आर्य”ऐसा समाजवाद जाए जहन्नुम में

स्वार्थ में करे जो जनता पर अत्याचार

 

अरुण कुमार ” आर्य ”

प्रधान

आर्य समाज मन्दिर

मुग़ल सराय,चन्दौली

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