#Kavita by Arun Kumar Arya

स्वतंत्रता का स्वरुप
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दशकों वर्ष बीत गए स्वतंत्र हुए हमें
थे स्वप्न हमारे, होंगे हम बहुत खुशहाल
कुर्सी क्या मिल गयी मेमने सब को
गुर्रा, चलने लगे वे भेड़िए की चाल।

बस रुप बदल गए दासता के हमारे
अब भी हैं हम अपने देश में गुलाम
बिना घूस के काम नहीं करते अधिकारी
इस आजादी का है कैसा यह अंजाम।

जिसको जहाँ मिलता लूट खा रहा
आजाद हैं ,लूटने को देश की सम्पत्ति
कौन कहेगा इन्हें माँ भारत का सपूत
आजाद देश के हैं ये तो महा विपत्ति।

कुछ लूट खा रहे माफिया रंगदारी
कहीं लुट रही बहन, बेटियों की आन
रक्षक ही भक्षक बन बैठे हैं अपने
किस मुँह से करें आजादी का गुणगान।

मुक्ति पाने को गोद सूनी हुई माताओं की
मौत को प्रिय हो गए उनके प्रिय लाल
सारा धन लूट रहे हैं मिल नेता,अधिकारी
झोली भर अपनी,देश को किए कंगाल।

हर ओर दिख रहे विकास के लक्षण
गिर गया नैतिकता ,ईमान का पारा
अंग्रेजों से लड़कर स्वतंत्र हुए थे हम
अब तो अपनों से ही हिन्दुस्तान हारा।

कुछ के बलबूते आकाश में उछाल मारे
मंगल तक जाने का बना लिए प्लान
शीघ्र चंद्रमा पर पैर रखने वाले हैं हम
तिरंगा गाड़ ,देंगे माँ भारत को सम्मान।

बड़े बड़े आयुध बनने लगे देश में
एटम बमों का खड़ा कर दिए जखीरा
हमारे उपग्रह घूम रहे हैं आकाश में
विकसित राष्ट्रों को होने लगी पीड़ा।.

बहुत कुछ निर्यात करने लगे हैं हम
बड़े बड़े कारखाने उगल रहे हैं आग
बहुत ही विकास किया देश हमारा
विश्व में जमने लगी है अपनी धाक।

सीमा सुरक्षा में हैं सजग हमारे सैनिक
शत्रु के घुस पैठियों का कर रहे हैं नाश
अपना सा मुख लेकर रच रहे खुराफात
कैसे पूरी होने देंगें हम उनकी आस ?

आजादी मिली बहुत त्याग तपस्या से
त्याग बिना झंखाड़ है यह उपवन
आर्य” त्याग करें हम गंदी सोच का
स्वतंत्रता है हमारा तन,मन और जीवन।

अरुण कुमार आर्य
प्रधान
आर्य समाज मन्दिर
मुगल सराय, चन्दौली।

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