#Kavita by Arun Kumar Arya

अन्तर्द्वंद की दशा
**”**”

संकल्प विकल्प मध्य उत्पात मचाता
करता मन को यह बहुत परेशान
कोई व्यक्ति नहीं दिखता जग में ऐसा
अन्तर्द्वंदाे का हुआ न हो जिसको भान।

हर कार्य मन के अनुकूल नहीं होता
हर व्यक्ति नहीं होता अपना मित्र
काम पड़ने पर आते समझ में सब
दुख में समझ आता लोगों का चरित्र।

हम चाहते काम अपने अनुकूल
प्रतिकूल होने पर व्यथित होते
कोई कोई तो काट लेते हँसकर
कोई कोई तो दिखते हैं रोते।

अच्छा क्या है,बुरा है क्या
लोगों की सोच पर करता निर्भर
कोई नहाता जा गंगा के बीच
कोई जल छिड़क लेता बैठ तट पर।

सत्य पिट जाता स्वार्थ के चक्कर में
लोभ,मोह का ओढ बैठे हैं जामा
ईर्ष्यावश कर जाते हैं अनुचित कर्म
कैसे कौन करें भले बुरे का पंचनामा।

द्वन्द तो विखरे पड़े हैं द्वार द्वार
अन्तर्द्वंद मन के अन्दर चलता
अकेले में रहते हैं जब बैठे लोग
अन्तर में यह बहुत मचलता।

अन्तर्द्वंद देता कुण्ठा को जन्म
रक्तचाप इससे बहुत बढ जाता
हार्ट अटैक की आती बारी इससे
ब्रेन हैमरेज हो,पक्षाघात हो जाता।

लोग कहते बहुत मत सोचा करो
परिस्थितियाँ करती सोचने पर मजबूर
आर्य” दुनिया में है उत्पाती जन बहुत
पास में रहते,मत सोचो उन्हें अपनों से दूर।

अरुण कुमार आर्य
मुगल सराय,चन्दौली

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