#Kavita by Arun Kumar Arya

राष्ट्र ही देवता है
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हे राष्ट्र सदा सजग रहे तेरे प्रति हम
जननी तू,जनक तू,तू ही है विधाता
राष्ट्र प्रेम नहीं जिस किसी हृदय में
भू पर जिन्दा रह वह मुर्दा कहलाता।

जिसकी माटी में खेल कूद बढे हम
जिसके अन्न जल ने हमको पाला
हवाएं जिसकी जीवनी शक्ति बन
रखती अपनी तरह हमें मतवाला।

रक्त के बूँद बूँद पर अधिकार उसका
तन के रग रग पर उसकी झलक
रक्षा में बिछाये रखे रहते निशि दिन
झपकाते नहीं कभी अपनी पलक।

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता: गूँजी
हिमालय के इस विस्तृत आंगन में
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसि
लिखा वाल्मिकि ने अपने रामायण में।

अयोध्या नरेश के भरे राज दरबार में
राष्ट्र देवो भव मान विश्वामित्र आये
सहर्ष समर्पित किया हृदय पुष्पों को
रावण को मार राम देवता कहलाये।

रणभेरी बजा राष्ट्र देव के सम्मान में
राणा शिवा कूदे युद्ध के प्रांगण में
खुदीराम,भगत,आजाद प्राण गँवाए
माता भारत के विशाल आंगन में।

दुर्गा, सारंधा, लक्ष्मीबाई, अहिल्या
राष्ट्र देव का पूजन करने चल पड़ी
दुश्मनों की क्या छुड़ायी खूब छक्के
तलवार उठा, घोड़े चढ वे युद्ध लड़ीं।

चलो चले हम माँ भारत के मन्दिर में
तन,मन,धन का लेकर कण्ठी माला
आर्य”जिन्दा है वही जगत में मानव
राष्ट्र को देव मान जिसने प्राण दे डाला।

अरुण कुमार आर्य
पं०दीन दयाल उपाध्याय नगर,चन्दौली।

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