#Kavita by Arun Kumar Arya

रक्त अब बहता नहीं है

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जागते रहे जब तक हम राष्ट्र हित

दौड़ता था नसों में हमारे लाल रक्त

बोलने लगे अपने,शब्द देशद्रोह के

रक्त जल बन जाम हो गया है सख्त।

 

लुट रही है संस्कृति बीच बाजार में

मौन हो खड़े देखते रहते सब कुकर्म

मुर्दा हो गयी है क्या लोगों की काया

मनुष्य कहने में उनको,आती है शर्म।

 

उठाये रण में तलवार राणा शिवा ने

मुगलों की शक्ति क्या खूब अजमाये

शपथ खाये मरने मारने की ये बाँकुरें

तलवार धार पर अपना रक्त चढ़ाए।

 

लड़ी थी लक्ष्मी झाँसी के महासमर

डलहौजी पर खून उसका खौला था

मंगल पाण्डे फूँक विगुल आज़ादी का

अंग्रेज़ों की ताक़त मेरठ में तौला था।

 

क्या ऊधम मचाया ऊधम ने ब्रिटेन में

धींगरा पहले चूमा फाँसी का फन्दा था

भगत गरज फेंका बम पार्लियामेन्ट में

यारों बिस्मिल क्या फौलादी बन्दा था।

 

सबके नसों में उबलता था रक्त गरम

सबके सब युवा थे आज़ादी के दीवाने

आग की लपटों से क्यों पूछते हो राही

अब तक मिटे तुझ पर कितने परवाने।

 

अन्याय, अत्याचार व शोषण देख जो

विरुद्ध उसके कभी कुछ नहीं कहता

मत समझो उसे कभी जीवित मानव

ऐसे  जनों के रगों में रक्त नहीं बहता।

 

कहते सब देश हमारा भारत  महान

चारों दिशा में इसका पूर्ण विकास हो

माल खा जाते गुपचुप बाँट लोग बड़े

भले ही देश का क्यों न सर्वनाश हो।

 

इनके रगों में नहीं बहा कभी रक्तधार

स्वार्थ में खून हो गया जल की धारा

शर्म करो राष्ट्र के कर्णधारों तुम सब

देश की अस्मिता का दोगे कैसे नारा।

 

अन्याय, अत्याचार और शोषण देख

विरोध में उसके जो कुछ नहीं कहता

उसे जीवित मानव कभी मत समझो

ऐसे जनों के रगों में रक्त नहीं बहता।

 

नसों  के खूनों को उम्र का नाम न दो

देश बचाने वालों का ही पहचान होगा

उबाल न आए जिस जिस के नसों में

वह ही मरा हुआ जीवित इंसान होगा।

 

बहुत खून बहे ,बहेंगें अभी कितने

हर कतरे का एक अंजाम होता है

काम आते जो समाज देश हित में

उसी खून का ही सम्मान होता है।

 

आयी थी सज धज बटोर ख़ुशियाँ

लाल चुनर में वह नव उत्साह लिये

दहेज की बेदी पर चढ़ गयी लाडली

ना जाने उसने कौन सा गुनाह किए।

 

सिमट गयी जीवन उसकी वहीं पर

वागों में उसके जहाँ पुष्प खिलना था

हत्यारे हो गये ऐसे ससुराल के लोग

क्या अर्थीअभी उसका निकलना था।

 

दौलत पर बेच दे जो जमीर अपनी

ऐसे हृदयों में धड़कन ही नहीं होता

आर्य” फाँसी की सजा है इनको कम

क्योंकि इन नसों में रक्त नहीं बहता।

 

 

अरुण कुमार आर्य

दीन दयाल नगर, मुगलसराय ,चन्दौली

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One thought on “#Kavita by Arun Kumar Arya

  • November 21, 2017 at 4:07 am
    Permalink

    बढ़िया लिख रहे हैं
    बध ई। आप को।

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