#Kavita by Arun Kumar Arya

 

सफ़र का सच

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मृत्यु के सफ़र से हैं यहाँ सब अनभिज्ञ

जीवन का सफ़र दिखता अति दुर्गम

सन्मार्ग पर चलना बहुत कठिन दिखा

संघर्ष से जूझना पड़ता है कदम कदम।

 

अति विशाल यह सुन्दर पृथ्वी हमारी

सौन्दर्य विखरे पड़े चारों ओर पग पग

विस्तृत नभ के ग्रहों पर पड़ गये कदम

देख मान जान लिया है यह सारा जग।

 

विनाश निर्माण नित दिखते चारों ओर

प्रकृति परिवर्तन की ओढ़नी ओढ़े खड़ी

ढूँढ़ा कलर का सिद्धांत सी बी रमन ने

निगाहें उनकी जब नील गगन पर पड़ी

 

सफ़र में घूम रहे नित सब अवयव

घूम रहें हैं ग्रह,नक्षत्र,सूर्य चाँद तारे

स्थिर हो जाएँगे जिस दिन ये सब

महा प्रलय के मिलेंगें लक्षण सारे।

 

सुख भोगने सफ़र में सब निकलते

दुख भोगने बैठेगा यहाँ कौन पुजारी

महा प्रयाण जीव का अन्तिम सफर

जग छोड़ जाना है सबकी लाचारी।

 

जैसा लक्ष्य वैसी सफ़र की तैयारी

साथ चलने को कहाँ कितने तैयार

सतर्क रहो पाने को मंज़िल अपनी

साथ देने को नहीं मिलेंगे कोई यार।

 

आकर कितने लौट चले गये यहाँ से

ऋषि,मुनि,राजा, रानी और सन्यासी

पशु,पक्षी,जीव ,जन्तु विखरे हैं कितने

इच्छा रही सफ़र की सदा से प्यासी।

 

पाने को कुछ हम निकलते सफ़र पर

पाने की इच्छा नहीं कभी खतम होती

बिन पाए खाली हाथ लौटते जो घर

भाग्य उसका माथ पर हाथ धर रोती।

 

कर्महीन भाग्यहीन समझता अपने को

कर्म से लिखा जाता भाग्य की कहानी

उच्च आकांक्षा ले चलो सफ़र में सदा

दिखे ने धरती पर तुम सा कोई शानी।

 

सफ़र का सिलसिल बना है सदा से

सफ़र का अंत कहाँ कहीं कभी होता

दिवस,क्षण श्रमित पथिक कर विश्राम

आगे चलने को बोझ कंधे उठा ढोता।

 

सबसे सुन्दर यात्रा मोक्ष का जग में

पाते जिसे ऋषि ,मुनि,योगी,ध्यानी

हजारों चकाचौंध भ्रमित हुए इसमें

देख देश,दुनिया,सुन्दरी,प्रकृति रानी।

 

सुख ढूँढ़े रहें हैं हम दुख की नगरी में

बोझ ढो सफ़र में निकलते कहाँ कहाँ

आर्य ” सफ़र को हम सफ़र बना लो

पाने को हृदय में बैठा है ईश्वर जहाँ।

 

अरुण कुमार “आर्य “

प्रधान,आर्य समाज मन्दिर

मुग़ल सराय चन्दौली।

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