#Kavita by Arun Sharma

धूप में नीम की छाँव है।

आ चलें जिंदगी गाँव है।।

*

मखमली शाम है, रात है

जीने का इक अनुपात है

भोर  आकर  हँसे  देहरी

नव  उमंगें  लिए  गात है।

कोंपलों में खिली चाँदनी

डाल  ऊपर  नई ठाँव है।।

*

प्यास पनधट बुझाते मिले

नाव  माँझी  चलाते  मिले

खेत  धानी  चुनर हो गयी

होंठ  हर  मुस्कुराते  मिले।

हाथ मेंहदी  रची प्यार से

लो  महावर  भरा पाँव है।।

*

तितलियाँ  गुनगुनाने लगी

गीत फागुन  के गाने लगी

मस्त  भौरे  मगन  हो  गये

हर कली मुस्कुराने  लगी।

क्यों गये  छोड़ परदेश पी

कूक कोयल लगे काँव है।।

अरुण शर्मा

 

 

 

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