#Kavita by Arun Sharma

ओ परिवर्तनशील हृदय अब,

कबतक तू परिवर्तित होगा?

झूम उठे मन का प्रांगण औ,

स्नेहिल हृदय समर्पित होगा।

*

रास, रंग  औ   बाण व्यंग से

कब  छूटेगा  मनुज  दंभ  से

अप्रदूषित जब रहा आचरण

क्योंअवयव फिर उपालंभ से

अहंकार   रसपान   निरापद

पीकर कब तक गर्वित होगा।

*

व्यस्त व्यंजनाओं में कबतक

उच्छल – सा  ये   मनोवेग  है

विषय  नहीं निर्मित विचार ये

उत्कंठा   का   प्रबल  वेग  है

ऐसा  क्यों  तू  सोच  रहा  है

ग्रंथों  में  सब  वर्णित  होगा।

*

अर्क गिरे जो नित्य अवनि पर

ऐसा   प्रिये   रसायन  बन  लो

प्रेम  पगे,  रसधार   बनो  तुम

सकल हृदय में पावन बन लो

विहंस मिले जब पुलकित क्षण

तन-मन-धन तब हर्षित होगा।

अरुण शर्मा

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