#Kavita by Ashok Singh Styaveer

पथदर्शी नवदीप जलाऐं

**

 

आओ इस घातक अँधियारे में भी, अपनी राह बनाऐं ।

विषवाही मन में युगकारी, पथदर्शी नवदीप जलाऐं।।१।।

 

छिन्न-भिन्न हों, गलें मूल से,

ये कुत्सित, घातक मंसूबे।

जिससे दुर्निवार अभिलाषा,

के पातक अब पूरे डूबें।

 

सावधान, संधान करो अब, निष्ठुर ग्रह विलीन हो जाऐं ।

विषवाही मन में युगकारी, पथदर्शी नवदीप जलाऐं।।२।।

 

चिन्ता की क्या बात?

रखो सुदृढ़ इच्छाबल।

गर्वभरी नव गूँज,

भरेगी उर में संबल।

 

यदि प्रयत्न होगा तन-मन से, तब प्रफुल्ल होंगी आशाऐं ।

विषवाही मन में युगकारी, पथदर्शी नवदीप जलाऐं।।३।।

 

संस्कृति की पावन धारा से,

विछुड़ रहीं माँ की सन्तानें।

क्या बिडम्बना? सुधी चाल पर,

नित मिलते हैं कुत्सित ताने।

 

किन्तु रहे संकल्प सुनिश्चित, सभी विपक्षी मुँह को खाऐं।

विषवाही मन में युगकारी, पथदर्शी नवदीप जलाऐं।।४।।

 

“सत्यवीर” गरिमा मत भूलो,

मर्यादा का रक्खो ध्यान।

स्वाभाविक अंकुश रख खुद पर,

कायम रखो आत्मसम्मान।

 

लाज सुरक्षित रहे गर्व से, अपना शुभ सिद्धांत बनाऐं ।

विषवाही मन में युगकारी, पथदर्शी नवदीप जलाऐं।।५।।

 

अशोक सिंह सत्यवीर

( सामाजिक चिंतक, साहित्यकार और पारिस्थितिकीविद)

उपसंपादक – भारत संवाद

 

 

138 Total Views 6 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *