#Kavita by Ashutosh Anand Dubey

श्रद्धेय महाकवि, गीतऋषि नीरज जी को मेरी यह रचना श्रद्धांजलि स्वरूप सादर समर्पित….. 🙏🏻

कारवां चल के थक गया, ठहर गया कैसे
वो शहर छोड़ ,अजनबी के घर गया कैसे

जिसने इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म कहा
वही इंसान जहां से गुजर गया कैसे

हो गम का गीत या कोई गजल रुमानी हो
ये आज मेरी निगाहों से झर गया कैसे

ज़िंदगी, मौत ही भले तेरा उसूल रहा
तो मेरी जिंदगी में ये जहर गया कैसे

आशियाना वो खुद बना हुआ था महलों का
वो अपने घर से निकल उसके दर गया कैसे

उसने हर दिल की उदासी को खुद पिया तो था
आज फिर यूँ हमें उदास कर गया कैसे

आज दिल दर्द ग़म उदास निगाहें खाली
मेरा हमदर्द यहाँ से उधर गया कैसे

नीर आशु के निगाहों से झर के सूख गये
आज नीरज का मन यूँ मुझ से भर गया कैसे

©आशुतोष’आनंद’दुबे
09584642494

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