#Kavita by Ashutosh Anand Dubey

नमन अटल को

धरा रो रही, आसमान रो रहा है
जमीं का हर एक इंसान रो रहा है
रो रहे हैं खूब ये बादल पिघलकर
गुलिस्तां का इक फरिश्ता सो रहा है

देखते ही देखते यूँ सांझ हो गई
आज यह धरती भला क्यूँ बांझ हो गई
फूल सूखे झर गये रसहीन हो गये
और मधुरिम गीत शांत विलीन हो गये

हिम शिखर भी आज बौना हो रहा है
गुलिस्तां का इक फरिश्ता सो रहा है

अश्रु अविरल यूँ बहे ना थम रहे हैं
सिंसकियों से सांस भी मध्धम रहे हैं
भावना का ज्वार यूँ उमड़ा पड़ा है
मन अंधेरे में न जाने क्यूँ खड़ा है

देह अब आकार अपना खो रहा है
गुलिस्तां का इक फरिश्ता सो रहा है

था अटल और है अटल ये भी अटल है
ना बुझेगा सूर्य कल ये भी अटल है
साधु सा जीवन सरल ये भी अटल है
आज सचमुच समय का हर पल अटल है

स्वर्ग भी अब स्वर्ग पूरा हो रहा है
गुलिस्तां का इक फरिश्ता सो रहा है…

©आशुतोष’आनंद’दुबे

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