#Kavita by Ashutosh Anand Dubey

चुनावी चकल्लस

वोटों का बाजार सजा है इसके साहूकार बड़े हैं
देखो सारे चोर उचक्के जनता के दरबार पड़े हैं
जनता जिनके चरणों में थी वे जनता के चरणों में
हाथ जोड़ते पैर पकड़ते सारे बरखुरदार खड़े हैं

साड़ी कपड़े रुपये पैसे घड़ियाँ और कैलेण्डर भी
ढूंढ-ढूंढ कर बांट रहे हैं राशन और सिलेन्डर भी
पाँच साल की कसर निभाते नेताजी घर-घर भटके
बंदर जैसी उछलकूद है घर के बाहर अंदर भी

आज चुनावी मौसम बदला सारे वोटर बदल गये
रुपये लेकर एक हमारे न्यूज रिपोर्टर बदल गये
नेता बदले मंत्री बदले शोकसभा में हँसते हैं
ठोकर लगते कमिया देखो थामे नागर बदल गये

खूब मलाई छक के खाई अब कितना तुम खाओगे
जीत गये फिर पाँच साल के बाद नजर तुम आओगे
जनता के तुम पास न जाना वोटों के व्यापारी हो
अबकी बारी हाथ लगे तो जनता से पिट जाओगे

©आशुतोष’आनंद’दुबे

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