#Kavita by Atul Kumar Shukla

”बस एक तुम्हारी कमी रहेगी”

 

बस एक तुम्हारी कमी रहेगी।

नीव मजबूत बनाऊं लेकिन,

कहीं तो उसमे नमी रहेगी,

बस एक तुम्हारी कमी रहेगी।

सूरज खुद पर आकर

ढल जाता है,

चाँद छत पर चढ़कर

चल जाता है।

बस एक तुम्हारी लौट आस मे,

हर क्षण,हर पल जाता है।

मोल नही उन्होंने रातों का,

जो खुली आँख से काटी है।

क्या तौलोगी दर्द दिलो का,

जो औरो मे बाटी है।

अब आगे हम क्या बतलाते,

जो भी जीवन बाकी है!

जीना तो पड़ता है लेकिन,

तुम बिन जीना माटी है।

चेहरे पर हँसी भले हो मेरे

पर दिल मे तुमसे ठनी रहेगी,

दर्द दिलो मे जमी रहेगी!

बस एक तुम्हारी कमी रहेगी।

 

अतुल कुमार शुक्ल–

सिद्धार्थनगर(यू पी)

7408847229

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