#Kavita by Avdhesh Kumar Avadh

शोषण से समरसता

 

शोषण का साम्राज्य मिटाकर समरसता फैलाएँगे,

माना कठिन डगर है लेकिन जाएँगे तो जाएँगे।

 

हाथों में हथकड़ी और पैरों में बेड़ी है तब भी,

दिल से सपने बुन लेंगे, आँखों से राह बनाएँगे।

 

नहीं चैन से बैठेंगे जब तक होंगे आजाद नहीं,

हँसकर तेरे जुल्मों के पावक से तुझे जलाएँगे।

 

एक बार बस एक बार लोहे में जंग समाने दो,

शोषण सभी मिटाएँगे,समरसता ध्वज लहराएँगे।

 

समरसता जिस हेतु भगत ने बलि बेदी को चूमा था,

उस बलि बेदी पर समाज के सारे जुल्म चढ़ाएँगे।

 

अवध न खोकर धैर्य धर्म का दामन छोड़ कभी देना,

मातृभूमि की कसम रात में भी सूरज ले आएँगे।

 

अवधेश कुमार ‘अवध’

8787573644

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