#Kavita by Avdhesh Kumar Avadh

निष्कर्ष

 

भावनाओं के समन्दर में न नश्तर अब चुभा।

धड़कनों ने कर रखा बेजार उल्फत में लुभा।।

 

ज्वार औ भाटे की पीड़ा भी सहा दुर्भाग्य से।

इस सितम के बाद, सुख शायद मिले कुछ भाग्य से।।

 

बस अवध इस चाह में हर जुल्म को सहता गया।

वो सुधर जाएँगे, बस इस आस में बहता गया।।

 

चाँद क्या दिन में दिखेगा या कि सूरज रात में!

जो न हो पाया कभी, होगा नहीं जज्बात में।।

 

भावना के अर्श से अब तो अब तो उतर जा फर्श पर।

खोलकर के बंद आँखें ध्यान दो निष्कर्ष पर ।।

 

अवधेश कुमार ‘अवध’

 

 

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