#Kavita by Avdhesh Kumar Avadh

कवि से बगावत

सुबह होकर तरोताजा
मन ने उद्वेलित किया
कि भावों के बवंडर को
उतार दूँ कागज पर
रोज की ही तरह
बना लूँ एक कविता
और ठेल दूँ
शान्तिसेना की तरह
या आक्रमणकारी की तरह
या गिरगिट की तरह
या एक दिन की जिंदगी वाले
अख़बारी समाचार की तरह
या कर्ण के शर पर बैठे
विषधर उग्रसेन की तरह
चापलूस की तरह
या मित्र की तरह
सैकड़ों लोगों के आस – पास।

किन्तु आज
कलम रूठ गई
शब्द बगावत कर गए
अक्षर बिखरते महागठबंधन के
अंग हो गए
स्वर मौन हो गए
और छंद हो गए बेबहर….
मैंने जनतन्त्र के सत्तासीन नेता की तरह
गिरगिट को लजाते हुए
भेड़ की तरह मिमियाते हुए
कवि सम्मेलन के आयोजक की भाँति
अकड़ और अर्ज को
उचित अनुपात में मिलाकर
समयानुकूल स्वरों में
पूछ ही लिया कि कारण क्या है?

मेरी लेखनी नुक्कड़ की नेता बन गई
और सब के सब उसके अनुगामी
मेरा हाल मतदान पूर्व प्रत्याशी जैसा
उनकी माँगें बढ़ती गई
मैं हाँ हाँ हाँ हाँ कहता गया
कौन सा पूरा करना था……
पर भीड़ से निकला एक सवाल
तमाचा सा गाल पर लगा
कविता ने कहा-
“कब तक हमसे खेलोगे?
हमारी मर्जी जाने बिना
दूसरों के घर ठेलोगे??
क्या कभी सोचा है कि-
हमारा कितना अपमान होता है?
कितना तिरष्कृत होकर
यहाँ वहाँ भटकना पड़ता है?
कभी जानने की कोशिश किया है?
तूँ चंद मिनटों में
सौतेले माँ बाप की तरह
बदरंग बनावटी बेढंग गढ़कर
कहीं और फेंक देता है…..
तूँ कवि है या कसाई?
तूँ पाँव की धूल भी नहीं है
और कहलाना चाहता है
सूर तुलसी कबीर मीराबाई
जा ….अब दूर चला जा
हे कविता के सौदाई।

अवधेश कुमार ‘अवध’

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