#Kavita by Avdhesh Kumar Avadh

तस्वीर

दीवारों के सीने को
परखते हैं लोग
बहुत बारीकी से
और नाप लेते हैं
कठोर कवच में
उसकी मृदुता ….।

काँटो के
दिलकश गुच्छों में से
चुनकर लाते हैं
कुछ काँटे
जो आसानी से
चुभकर
खुद का स्थान बना सके
मौन दीवारों के दिलों में
और फिर
उसके सहारे
टांग सकें
तस्वीरें
जिस पर कालान्तर में
लटक सके
फूलों की माला………।

दीवार सम्हालती है कील को
कील तस्वीर को
और तस्वीर माला को
माला बदलती रहती है
एवं बदलते रहते हैं लोग
बदलती हैं भावनाएँ भी
किन्तु
तस्वीर की स्मित को
न मतलब है कील से
न कील लगाने वाले से
कभी – कभी तो
बदलती हैं तस्वीरें भी
अब तलाश है मुझे भी
एक रिक्त कील की
जिस पर लटक सके
मेरी भी तस्वीर
एक माला के साथ ।

अवधेश कुमार ‘अवध’

Leave a Reply

Your email address will not be published.