#Kavita by Avdhesh Kumar Avadh

सिसकता बचपन
————————————–
सोने – चाँदी  की  प्याली   में, दूध – भात जो खाया हो l
मात – पिता, दादी – नानी की, गोंदी  में    इतराया  हो ll

पूछो  जीवन क्या है उससे,  जो अनाथ बन जीया हो l
अपनी आँखों के आँसू को, अपने  मुख में पीया हो ll
जग वालों की हर गाली को, सुनकर भी मुस्काया हो l
हँसते – रोते अपने  द्वारा, खुद को भी बहलाया हो ll
नन्हें  हाथों गढ़कर जिसने, अपना भाग्य  बनाया हो l
सोने – चाँदी की प्याली में, दूध – भात जो खाया हो ll

कूड़ा – करकट के ढेरों पर, श्वान – नींद जो सोया हो l
आवारा पशुओं सँग रहकर, मानवता  संजोया हो ll
गिरते – गिरते उठ जाने के मूलमन्त्र को जाना हो l
जीवन इक संघर्ष – कहानी जीकर जिसने माना हो ll
बचपन की जब बातें होती, दर्द  उभरकर आया हो l
सोने – चाँदी की प्याली में, दूध – भात जो खाया हो ll

लोरी  के  बदले में गाली, जिसके हिस्से आई हो l
जोर  मारती  आग  पेट में,  अल्ला,  राम  दुहाई  हो ll
अम्बर – वसुधा के पाटों में, जन्म – मरण को झेला हो l
हाथ तिरंगा लेकर जिसने, विजय – खेल को खेला हो ll
सुनकर भारत  की महिमा को, अश्क पोंछ जो आया हो l
सोने  – चाँदी  की प्याली   में, दूध – भात जो खाया हो ll

Leave a Reply

Your email address will not be published.