#Kavita by Avdhesh Kumar Avadh

मोह की जंजीर

वक्त के खूँटे से बाँधा मोह की जंजीर ने ।
मुग्ध होकर मैं बँधा ज्यों बाँध रक्खा हीर ने ।।

ना मुझे शिकवा शिकायत ना ही मुझको चैन है ।
भेद मैं कैसे बताऊँ वार है या रैन है ।।

खोलकर दिल रख दिया मैनें जो उनके सामने ।
भीम को धृतराष्ट्र बनकर वो लगे थे थामने ।।

बस भरोसा ही छला जाता रहा हर काल में ।
कौन बच पाया भला फँसने से, फेंके जाल में ।।

प्यार उनका तीर सा मेरे कलेजे में चुभा ।
किन्तु इसके बाद भी ये दिल मेरा उनपर लुभा ।।

कब समझ पाओगे बोलो ऐ अवध तुम वक्त को ।
धो रहे अपने पराये सारे नूनो – रक्त को ।।

अवधेश कुमार ‘अवध’
9862744237

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