#Kavita by Avdhesh Kumar Avadh

माफ़ कर दो लेखनी

सर्वदा वह लेखनी मेरी मुझे धिक्कारती है,
लोभ में बदनाम को जब नाम मैंने लिख दिया था ।

लूटकर जनमत खजाना बन गये जो श्वेतपोशी,
मंतरी को संतरी निष्काम मैंने लिख दिया था ।

नारियों को देखकर जो लार टपकाते रहे हैं,
रावणों दु:शासनों को राम मेंने लिख दिया था।

भूलकर गुरु की महत्ता काटते हैं अंगुठा जो,
त्याज्य गुरु गुणहीन को गुणवान मैंने लिख दिया था ।

माफ कर दो लेखनी मेरी ‘अवध’ माता सरिस,
स्वार्थ में शैतान को इंसान मैंने लिख दिया था ।

अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय 8787573644

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