#Kavita By Avdhesh Kumar Avadh

पिंजरे

पिंजरे में तोता
कई बार पंख नुचवाकर
थक – हारकर
बार बार भूख हड़ताल करके
असहयोग का हुंकार भरके
आदेश बहिष्कार करके
गमगीन बैठा था
किसी सुनहरे आगत के
ख़्वाबों में ऐठा था।

तिरंगे की खुशबू
लेकर हवा आई
भारत माता की जय
लगा पड़ने सुनाई
खुशी के आँसू छलक आए
कमजोर शरीर में
उत्साह के कीड़े भी कुलबुलाए
पिंजरे के लोहे
लोहे में लगी जंग
खाने की कटोरी
पीने का पानी
हवा धूप बारिश
सबमें अपनत्व नजर आने लगा
दिल उस पल के लिए
मुस्कुराने लगा
जब आकर अपने
यशगान कानों में घोलेंगे
पिंजरे को सहर्ष खोलेंगे
और मैं सगर्व……।

इंतजार में आँखें पथराईं
परिवर्तन की आँधी
कुछ शब्दों को लाई
कुछ को उड़ा ले गई
पुराने हो चुके पिंजरे
बदले गए
अब मिर्च में मधु लगाकर
परसा जाता है मुस्कुराकर
हम गरीब लोग
स्वाधीनता के नाम पर
अकड़े हुए हैं
नये नये व लुभावने
पिंजरों में जकड़े हुए हैं।

डॉ. अवधेश कुमार ‘अवध’
8787573644

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