#Kavita By Avdhesh Kumar Avdhesh

सुविहान

जब अपने हुए कसाई,
तो किससे करें दुहाई।
वक्त बदलता देख पराया हुआ सहोदर भाई।।

यह है चुनाव की बेला,
सब खेल रहे हैं खेला।
होड़ लगी आगे जाने की गुरु हो अथवा चेला।।

सारे नारे भड़काऊँ,
क्या समझूँ क्या समझाऊँ।
लोकतन्त्र जब अंधा है तो दर्पण किसे दिखाऊँ।।

फिर बात न उसने मानी,
करता है बस मनमानी।
खुशबू कैद न कर पाया तो दिया उजाड़ निशानी।।

अब क्या होगा पछताकर,
मुर्दा पर नेह लुटाकर।
अवध वक्त बर्बाद करो ना जाओ कर्ज चुकाकर।।

डॉ. अवधेश कुमार ‘अवध’
मेघालय 8787573644

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