#Kavita by Babita Kumari

व्यथा गंगा मईया की(गीत)

 

गंगा मईया रो-रो कहे

काहे उतारा हमें

काहे उतारा

अरे ओ भगीरथ

काहे उतारा ब्रह्म कमण्डल से

काहे उतारा

पापनाशनी बनते-बनते

हो रहा नाश हमारा

काहे उतारा हमें

काहे उतारा

गंगा मईया रो-रो कहे

शिव की जटा में थी

मैं कितनी पावन

धरा को पावन करते-करते

हो गई मैं बेसहारा

काहे उतारा हमें

काहे उतारा

 

गंगा मईया रो-रो कहे

काहे हमें मुनि के उदर से

निकाला

लोगों ने सारा कचरा

मेरे उदर में ही डाला

लगा दम घुटने हमारा

काहे उतारा हमें

काहे उतारा

गंगा मईया रो-रो कहे

मेरा जल था कितना निर्मल

अब तो रूकती मेरी सांसे पल-पल

बहेगी कैसे मेरी चंचल धारा

काहे उतारा हमें

काहे उतारा

गंगा मईया रो-रो कहे

गंगा मईया रो-रो कहे.

 

बबीता कुमारी

समस्तीपुर,बिहार.

One thought on “#Kavita by Babita Kumari

  • July 11, 2018 at 1:06 pm
    Permalink

    Sabhi dristi se achchha,. Thanks,

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