#Kavita By Babita Kumari

चुनाव के मौसम में

चुनाव के मौसम में
वादों की वारिश में
जनता नहाए छम्-छम्…..

पार्टी का झंडा टांगे निकले हम.
रातभर जाग-जागकर
गला फाड़-फाड़कर
ख्वाबों में खो गए हम.
वादों की वारिश में
जनता नहाए छम-छम…..
पक्की सड़क
सून दिल जाए धड़क
छत का मकान
जैसे सारा जहान
दो-चार रुपय किलो गेहूँ-चावल
खुशी से मन हो गया पागल
चुनाव के वारिश में
जनता नहाए छम्-छम्….
नारा बदले,चोला बदले,
कभी हिन्दू,कभी मुस्लिम.
पैदल गली-गली
घुमा करते
बन कर संत.
वादों की वारिश में
जनता नहाए छम्-छम्…
चलता जलसों का दौड़
इस मौसम में नहीं कोई ठौर
पलभर का चैन नहीं
हर गली का उठता कौर.
वादों की वारिश में
जनता नहाए छम्-छम्…..
मौसम बदला वारिश बंद
नेताजी ऐसे निकल गए
हो जैसे अंध.
चारों तरफ कीचड़ ही कीचड़
पैर फिसल गया
गिर दए धम्…..
चुनाव के मौसम में
वादों की वारिश में
कहीं खो गए हम.

बबीता कुमारी
पटोरी,समस्तीपुर,बिहार

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