#Kavita by Bablu Kumar Rahi

मैं जी रहा हूँ

 

सत्य पर असत्य का

नकाब पहना हूं! यह

असत्य भी क्या असत्य

जोकि एक सत्य हैं।

अंत:प्रभा दबाएं असत्य-

नाव पर चल पड़ा हूं,

एक ही मंजिल हैं

अपनी पहचान की

पुरुषार्थ, आदर्श की

वायु में लहराती बातों की

अमूर्त शब्दों को मूर्त बनाने

का प्रयास चल रहा हैं

मानों पलाशी का युद्ध

चर रहा हो, हां मैं जी

रहा हूं, असत्य के सहारे

असत्य में चिपके सत्य के

सहारे कटु जीवन जी

रहा हूं, हां मैं जी रहा हूं।

 

: बब्लु कुमार राही

 

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