#Kavita by Bhauraw Mahant

 

गीतिका

आधार छंद – सरसी

विधान – 27 मात्रा,  16, 11 मात्रा, अंत में गाल

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दौलत वालों की मैं मित्रो, बतलाता हूँ हाल।

सच कहता हूँ दिल के सारे, होते हैं कंगाल।

 

दरवाजे पर जब जाता है, उनके पास गरीब,

होती उनकी बंद तिजोरी, नहीं निकलता माल।

 

झांसे में जो उनके पड़ते, समझो बुरा नसीब,

मुश्किल से पैसे देते पर, लेते ब्याज निकाल।

 

पाई – पाई जोड़ा करते, खोकर चैन – सुकून,

दौलत खातिर पाला करते, दुनिया में जंजाल।

 

थोड़ी खुशियाँ पाने उनसे, जो भी लेता कर्ज,

खुद ही अपने जीवन में वह, दुख को लेता पाल।

 

दो नंबर का करते धंधा, करते भ्रष्टाचार,

खून चूसकर निर्धन का ही, बनते महल विशाल।

 

उनके झांसे में मत आना तुम, समझाता है राव,

सूखी रोटी खा लो चाहे, मत खाना तुम दाल।।

 

भाऊराव महंत

 

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