#Kavita by Bhuvesh Kumar Cintan

तख्ती कलम बुद्भिका ,
खडिया बचपन भूल गया।
रबर पेंसिल कापी,
पाकर मन में फूल गया ।।

चरखी और फिरकनी ,
गुल्ली डंडा चले गये
लूडो सांप सीढ़ी कैरम के,
दिन भी भले गये ।।
ताश और क्रिकेट भी ,
अब ना अच्छे लगते हैं।
गेम वीडियो वाले अब,
तो सच्चे लगते हैं ।।

बचपन के कांधों पर ,
भारी बस्ता झूल गया ।।******

दूर गांव की शाला,
तक पैदल ही जातै थे ।
वापस आने में हंगामा,
खूब मचाते थे ।।
कच्ची अमियां झरबेरी,
के लगते बेर भले ।
थैलों में इमली बीजों,
के बनते ढेर मिले।।

चाऊमीन ,बर्गर ,पीजा,
में हो मशगूल गया ।।*******

शरारतें कम हुयीं हो ,
गया बोझिल सा बचपन ।
कम्प्यूटर की चालाकी से ,
चोटिल सा बचपन।।
फिर भी हंसता मुस्काता,
सा मन को भाता है ।
कितनी भी मुश्किल हों,
आगे बढ़ता जाता है।‌।

कितने भी संशय आते,
ये हो निर्मूल गया ।।******

भुवनेश चौहान चिंतन
भक्ति व ओज कवि खैर , अलीगढ़
ऊंप्र 202138

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