#Kavita by Bhuvnesh Kumar Chintan

तन वैरागी मन वैरागी,

घूमे दुनियां भागी भागी ।

साथ नहीं कुछ भी जाना है,

फिर भी धन की लिप्सा जागी।।

 

ये सुंदर संसार बनाया,

परम पिता की है सब माया,

हमें सौंप दी है मालिक ने,

सुघड ,सलोनी, कंचन काया।।

 

मुफ्त हवा ,पानी,प्रकाश सब,

सोचे ना यह बुद्भि अभागी।।………………

 

रंग रंग के फूल खिलाये,

फूलों पर भँवरे मडराये।

यह बसंत ऐसा बौराया,

कोयल पपीहा नाचे गाये।।

 

कल कल झरनों का स्वर,ऐसा

हुयी प्रकृति कैसी बडभागी।।……….

 

मन के मोती बिखर रहे हैं,

एक एक कर निखर रहे हैं।

मनका मनका ढूँढ पिरो लो,

गुंथ माला में संवर रहे हैं।।

 

धरती के रंग अजब निराले,

मानो प्रेम पाग में पागी।।…………

 

भुवनेश चौहान”चिंतन”

भक्ति व ओज कवि ,खैर,अलीगढ

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