#Kavita by Bijendra Singh Saral

चौपइया छंद [सम मात्रिक] ◆

 

विधान~

{4 चरण समतुकांत,प्रति चरण 30 मात्राएँ,

प्रत्येक में 10,8,12मात्राओं पर यति

प्रथम व द्वितीय यति समतुकांत,

जगण वर्जित,प्रत्येक चरणान्त में गुरु(2),

चरणान्त में दो गुरु होने पर यह छंद

मनोहारी हो जाता है।}

 

सुन लो माँ वाणी, जग कल्याणी,

ज्ञान विनय की दाता।

द्वारे जो आये, शीश झुकाये ,

वो ही सब कुछ पाता ।।

हे हंस वाहिनी, ज्ञान दायिनी,

मैं तेरे गुण गाता ।

तम की तुम नाशक, बुद्धि विकासक,

सरल सदा ही ध्याता ।।

 

गुरु पुण्य  प्रभाकर, सब गुण आगर ,

अब चाकर रख लीजे।

मम ज्ञान प्रदाता, भव भय त्राता,

नेह  सुधा रस दीजे ।।

बलिहारी जाऊँ ,कीरति गाऊँ,

नित्य मनाऊँ देवा ।

आया मैं द्वारे, आज तुम्हारे ,

सरल करेगा सेवा।।

 

हे दीन दयाला, जग प्रतिपाला,

नाथ सहायक मेरे ।

मूरख मैं कामी ,सुन लो स्वामी,

संकट मुझको घेरे।।

प्रभु तारन हारे ,आप सहारे ,

काटो दुख बहुतेरे ।।

विनती मम सुन लो ,निज प्रिय चुन लो,

नित लगते सुख फेरे।।

 

सरल मैनपुरी

 

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