#Kavita Bijendra Singh Saral

पुलवामा दुर्घटना से एक साहित्यकार के हृदय में जो भावों का तूफान उठा । उनमें से कुछ भावों को ताटंक छन्द में शब्द देने का प्रयास किया है ।

पहली बार विरोधी भाषा,
पाक नींच जब बोला था ।
काले मतवाले विषधर ने,
अपने मुँह को खोला था ।।
उसी समय हत्यारे के ,
मुँह में गोला पेला होता ।
तो शायद बेटे खोने का ,
दंश नहीं झेला होता ।।

खून पसीने के पैसे से ,
जो सुविधाएं ना पाते ।
काश्मीर के बाशिंदे भी,
उनके गीत नहीं गाते ।।
केवल बातें ही करते हो ,
जिस पर हम शर्मिंदा हैं ।
जिस ने बेटों को मारा है,
क्यों वे अब तक जिंदा हैं।।

बनीं सुहागिन अब विधवाएँ ,
तुमको लाज नहीं आई ।
बिना लड़े जनहानि हो गई ,
चूक सुरक्षा में आई ।।
प्रहरी कहते हो तुम खुद को,
फिर भी मुश्किल जीना है।
कैसे मानूँ देशभक्त का ,
छप्पन इंची सीना है।।

मानवता ही दानवता से,
बार बार क्यों हारी है ।
पकड़ पीट कर उन्हें छोड़ते,
यह भी कमी हमारी है ।।
गीता में भगवान कृष्ण ने ,
जो संदेश सुनाया है ।
दुष्ट दलन में पाप नहीं है ,
मेरे मन को भाया है ।।

पापी जहर उगलने वाले ,
हर सीने में गोली हो ।
सबक पीढ़ियाँ इनकी सीखें,
तब शहीद की होली हो ।।
मोमिन सीने में बसते हैं ,
पर कलाम अब्दुल जैसे।
कतरा- कतरा हुई जवानी,
थे हमीद मेरे ऐसे ।।

खड़े साथ संकट में रहते,
बनते सदा सहारे हैं ।
मातृभूमि पर मिटने वाले,
प्राणों से भी प्यारे हैं ।।
देश प्रेम मन में बसता है,
वे इकवाल हमारे हैं ।
भारत माता की जय बोलें,
आतंकी से न्यारे हैं ।।

विष की बेल बढ़ाने वाले ,
मुल्ला हैं या काज़ी हैं।
देशद्रोह नस नस में जिनके,
वह गद्दार नमाजी हैं।।
मानवता में ज़हर घोलते,
खाते कसम मदीने की।
बोटी बोटी कर दो अब तो ,
ऐसे नींच कमीने की।।

वंश मिटेगा एक बारगी,
फिर गद्दार नहीं होंगे ।
हिंदू मुस्लिम के बेटे भी,
यूँ बेकार नहीं होंगे ।।
एक बार पतझड़ हो जाए ,
नई कोपले आती हैं ।
पहले बंजर करना पड़ता,
तब फसलें लहराती हैं।।

बिजेन्द्र सिंह ‘सरल’

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