#Kavita by Binod Kumar

मजदूर
दाल रोटी की ही चाह,
किसी से करे न डाह।
चाहत सीमित रखे,
ऐसे मजबूर हैं।
चाहे बड़े हो मकान,
इनका ही श्रमदान।
कल कारखाने खेती,
सब में जरूर है।
सुनते सभी की बात,
चाहे दिन या हो रात।
सेवा का ही भाव सदा,
इन पे गुरूर है।
फिर भी दीखे न छाँव,
धन का सदा अभाव।
आस भगवान का ही,
ऐसे मजदूर हैं।
बिनोद कुमार “हँसौड़ा

Leave a Reply

Your email address will not be published.