#Kavita by Binod Kumar

घनाक्षरी

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बदलें नजरिया को, सोचने के जरिया को।

निराशा का भाव फिर, मन में न आयेगा।

 

धीरज से काम कर,हार का न रख डर।

जीत एक दिन होगी,वक्त बतलायेगा।

 

मन में लगन रहे,चाहे कोई कुछ कहे।

तुझसे हैं जलते जो,खुद पछतायेगा।

 

करो नेक कार्य तुम, सेवा अनिवार्य तुम।

प्रभू की कृपा से तेरा, भाग्य जाग जायेगा।

 

 

भ्रूण हत्या महापाप,कैसे बुद्धिजीवी आप।

अपने ही अंश को न,

कोख से गिराइये।

 

बेटी बेटा एक जान, दोनों ही तेरी संतान।

बेटी के जनम पे न, मुँह लटकाइये।

 

अब तो करें विचार,सपने करे साकार।

प्रतिभा बेटी में हो तो,उसको पढ़ाइये।

 

जो भी माँगता दहेज,दीजिये उन्हें सन्देश।

बेटी है खिलौना नहीं, दूजा घर जाइये।

 

 

पेड़ पौधे प्राण बुझ,प्रकृति का शान बुझ।

पेड़ न रहे तो सारा,जग मिट जायेगा।

 

फल फूल लाते यार,जरा तू करो विचार।

प्रकृति ही देती हमें,और कहाँ पायेगा।

 

जनम से मृत्यु तक,इनकी देखे झलक।

काठ का सामान सारे,कैसे बनवायेगा।

 

अब भी प्रतिज्ञा कर, जनम दिवस पर।

कम से कम एक भी, पेड़ तू लगायेगा।

 

 

जोड़ी सालों साल रहे,दोनों खुशहाल रहे।

हर ख़ुशी मिले उन्हें,आशा भगवान से।

 

जीवन आवाद रहे,कोई न विषाद रहे।

पूर्वज आशीष देवे,उन्हें आसमान से।

 

सबसे ही प्यार रहे,कोठी और कार रहे।

भरा घर द्वार रहे, अनेकों सामान से।

 

हीर राँझा को दे मात, प्यार बढ़े दिन रात।

इनकी जोड़ी अनोखी,निकले जुबान से।

 

 

होना है सफल तुझे,देखना है कल तुझे।

हो भी आत्मबल तुझे, बहुत जरूरी है।

 

खुदी पे भरोसा करो,मन तू लगा के पढ़ो।

कार्य न कठिन कोई,श्रम गति धूरी है।

 

आज असफल हुए,चित्त से विकल हुए।

पथ से भटक गये, कैसी मजबूरी है।

 

एक लक्ष्य साधकर,गाँठ एक बाँधकर।

काट दे जंजाल सारे,तेज तेरी छूरी है।

बिनोद कुमार “हँसौड़ा”दरभंगा(बिहार)

 

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