#Kavita by Binod Kumar

मन के अंदर रावण कितने👺

चाहत के अम्बार लगाकर,
अब न पैर पसारो।
मन के अंदर रावण कितने,
पहले उसको मारो।
गैरों की उन्नति देखकर,
धू-धू कर जलते हो।
मानवता के पथ से हटकर,
मनमानी चलते हो।
क्या लेकर जाओगे जग से,
अब भी तनिक विचारों।
मन के अंदर रावण कितने,
पहले उसको मारो।
एक पल चौबीस सेकेण्ड भी,
मन पर संयम रख लो।
प्रेम और सेवा संबल हो,
स्वाद जरा तुम चख लो।
दीन-हीन से घृणा छोड़ो,
अवगुण को ललकारो।
मन के अंदर रावण कितने,
पहले उसको मारो।
माँ-बाप गुरुजनों बड़ो का,
जब सम्मान करोगे।
भूलकर भी फिर तो सपनों में,
गलती नहीं करोगे।
सबके जीवन में खुशियाँ हो,
प्रभू से यही पुकारो।
मन के अंदर रावण कितने,
पहले उसको मारो।

बिनोद कुमार “हँसौड़ा”

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