#Kavita by Bipin Giri

राम-रावण संवाद

हूँ विद्वान महान मैं,है ऊँची मेरी जाति।
फिर क्यों मैं छला गया,युद्ध भूमि में आज।।

माफ करो हे लखन लाल,मेरी विनती तोय।
मुझ जैसा पापी भला,ज़िंदा बचा है कोय।।

बोले तब रघुराज हैं,कोई नहीं तुम्हारा दोष।
दण्ड के भागी हो बने,अहम् के बस में होय।।

तुम पंडित महान थे,जानें हैं जग के लोग।
जाने क्यों तुम सत्य से,अपना मुख लिए मोड़।।

भक्त हो तुम शिव-शंभू के,जाकर नहीं है अंत।
फिर क्यों विचलित हुए,बनकर के शिवभक्त।।

दशासन लेटा कह रहा,माफ़ करो सियाराम।
मैं खुद मुक्ति चाहता,जो मिला आपके हाथ।।

सत्य,अहिंसा पर चलो,धरो न मन में दम्भ।
मैं अकेला जा रहा हो,दुनियाँ से बदरंग।।

रावण बोला जोड़कर,अपने कर को साथ।
हे जग वालों मै बना,प्रभु चरणों का दास।।

“गिरि बिपिन”

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