#Kavita by Bipin Giri

प्रेम के फूल

छुपा कर फूल में कुछ शूल जो तुमने मुझे दिया
दर्द तो भर गया फिर आज भी तुम याद आते हो

वफ़ा न कर सके तुम तो जफ़ा के सिलसिले दिये
जख्म इतना गहरा था की कोई बैद्य ना मिला

मुझे तुम याद आते हो एक पल में सौ-सौ बार
तुम्हें पाया तो नहीं पर खोना भी मुनासिब कहाँ

तुम्हें ढूढ़ा मैं हर अक्श,धुप औ स्याह घटाओं में
तुम्हारी शक्ल थी खोई कहीं इनके दियारों में

तिजारत में तुम्हारे बीतता हर सुबहो-शाम मेरा
न जाने कौन सी कस्ती की तुम रखवार हो गयी

मैं हर वक्त हूँ परेशां सबब ये सोचकर अब तो
क़यामत का असर उनसे अछूता आज भी क्यों है

“गिरि बिपिन”

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