#Kavita by Brij Vyas

दिल की बात

लबों पे आई !!

 

ऊंची सोच ,

भेद गहरा है !

अभिव्यक्ति पर

मौन पहरा है !

मनमानी है ,

भेदभाव है !

नंगे सिर ,

कुछ के सेहरा है !

हुई अनसुनी ,

बनी रुसवाई !!

 

सरकारों से

बंधा प्रशासन !

कोरे वादे ,

मिथ्या वाचन !

रायशुमारी ,

यहां कहां है !

अपने किये का ,

होता वादन !!

आहत आहें ,

हैं रंग लाई !!

 

हैरत में

जनता ज्यादा है !

उन्हें फैसला ,

कहाँ आता है !

सोच जजों की ,

जज ही जाने !

अंतर्कलह ,

किसे भाता है !!

दें प्रजातन्त्र की ,

सभी दुहाई !!

 

राजनीति की

बू छाई है !

सब के सर ,

चढ़ चढ़ आई है !

कोई नहीं ,

अछूता लगता !

बुद्धि सभी की ,

भरमाई है !!

है वर्चस्व की ,

छिड़ी लड़ाई !!  बृज व्यास

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