#Kavita by Brij Vyas

” इरादा कत्ल का या ,
साज़िशों का दौर है ” !!

गहरा सागर ,
डूबने का डर !
जाने कैसा ,
होगा मंज़र !
अब है परवाह किसको ,
दूर तक ना छोर है !!

हैं होठों पर ,
कितने फ़साने !
मद के प्याले ,
राम जाने !
प्यास जन्मों की मिटेगी ,
हाथ अब ना ठौर है !!

रंगीनियां अब ,
रंग चढ़ी हैं !
उंगलियों में ,
जादूगरी है !
कशिश आंखों में कितनी ,
चाहतें पुरज़ोर है !!

डूबे हुए हो ,
सोच गहरी !
हम तो मौजी ,
ठहरे लहरी !
अंज़ाम तो रब के हवाले ,
लुट गये ये शोर है !!

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