#Kavita by Abhishek Singh

पत्थरों पर एड़ियाँ रगड़ता एक मजदूर

चिलचिलाती धूप सर पे

और अपने हालात से लड़ता एक मजदूर

दूर से दिखता एकदम काला स्याह

धूप नें जैसे जला दिये हों उसके जिस्म को

रूह  काँप जाये देख कर उसकी मेहनत को

जी तोड़ मेहनत करता अौर

अपने मुकादम से डरता एक मजदूर

हालात से लड़ता एक मजदूर

उसकी मेहनत बयाँ करती उसके संघर्ष की कहानी

सर से टपकता वो पसीना पांव पे छीटा बनके गिरता

मैं वहीं खड़ा देखता रहा उसे

वहीं था एक पेड़ जहाँ वो रूकना चाहता था

कि कुछ देर उसे छांव मिले

पर सर पे लदी वो बोझ उसे रूकने न देती

मैं यही सोंचता रहा कि रोज यहाँ मरता एक मजदूर

अौर अपने हालात से लड़ता एक मजदूर

मेरा मूख चुप और आँखे उसको ताड़ती

मेरी आत्मा देश के इस नीति को फटकारकती

इतनी मेहनत करके भी क्यों मरता है एक मजदूर

अपने हालात से लड़ता एक मजदूर

वो उस पंच मंजिला इमारत के सामने

तुच्छ से दिखता था

पर मैं तो देख रहा था उसका ये योगदान

जो मंजिला बना रहा था वो खुद के लिए नहीं

किसी और के लिए

फिर भी इतना लगन जैसे खुद के लिए बना रहा हो

मंजिला तैयार होते हीं कोई टिकनें ना देगा

उसे एक भी पल

फिर भी मर रहा है वो मंजिला के लिए हरपल

अब भी उसकी मेहनत जारी है

और क्या करता एक मजदूर

अपनें हालात से लड़ता एक मजदूर।

“”””””””””””””””””””””अभिषेक सिंह।।।

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