#Kavita by Abhishek Singh

मैं चला आ रहा था

उन्हीं पुरानी गलियों से

जहाँ वो खड़ी मिली

वो एक चमकते शीशमहल सी

मैं मटमैला पत्थर सा

मजबूरी, बेबसी,लाचारी से

झुकी थी मेरी आँखें

खुद को छुपाता शीशमहल से

दिख न जाऊं कहीं शीशमहल में

सामनें से गुजरी, मुझपे हँसती

मेरी मजबूरी, मेरी खामोशी

को बुजदिली समझती

ख़ामोश गुमसुम

चली जा रही थी

इसी उधेड़बुन में आज

बजाये खालीपन को भरने को

कोरे कागज को भर रहा हूँ मैं

मैं खुद की भावनाओ को कभी लिखता

कभी पढ़ रहा हूँ मैं।

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