#Kavita by achyutam keshvam

वृक्ष तेरी रागमयता ,
आज मुझ पर झर रही है .
तन समूचा भीजता है,
मन सुवासित कर रही है .

हरीतिमा श्यामल तुम्हारी,
इन्द्रधनुषों को लजाती.
धर प्रलय के शीश पर पग,
बीन जीवन की बजाती.
गंधमय वानस्पतिकता ,
चर-अचर में तिर रही है .
वृक्ष तेरी रागमयता ,
आज मुझ पर झर रही है .(१)

सात्विकी मकरंद छाया,
ओढ़नी सी ओढ़ लूं मैं .
तव सुमन की सौम्यता से,
मृदुल नाता जोड़ लूं मैं .
नीड़कामी लघु-विहंगिनी ,
शाख पर तृण धर रही है .
वृक्ष तेरी रागमयता ,
आज मुझ पर झर रही है .(२)

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