kavita by akash khangar

एक सवाल
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समाज के ठेकेदारो से करती मैं सवाल,
नारीत्व पर ऊँगली उठाने से पहले, क्या किया, अपनी माँ बेटी का ख्याल
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वो जो मुझे तारण का अधिकारी कहते है,
वो जो मुझे पैर की जूती कहते है,
कहने से पहले जरा, अपनी माँ बेटी का ख्याल करो
क्या उन्हें न होगा, तुम्हारी दरिंदगी का मलाल

एक बात मुझे बतलाये कोई,
जिंदगी के उसूल समझाए कोई,
पत्थर की मूरत देवी तुम्हारे लिए,
घर की लक्ष्मी का कोई अस्तित्व नहीं,
मेरे स्वरुप की पूजा और मुझसे ही खिलवाड़,

रातो को जो ये कोठे सजते है,
सिर्फ कुछ वेहशियो के दम से चलते है,
मजबूर तुमने किया है मुझे,
वेहशी तुम हो, मैं वैश्या नहीं,
क्यों मेरी बेबसी का एक पल आता नही ख्याल,

महाभारत भी करा सकती हूँ,
दुनियां को मिटा सकती हूँ,
तुम्हारी चंद साजिशो की औकात क्या,
जब मैं लंका जलवा सकती हूँ,
मुझसे नहीं अपनी माँ बेटी से करो सवाल

कौन है जो मेरे बिना जन्म ले सकता है,
मेरे होने से ही तो सारा संसार चलता है,
मुझे मारकर कोख में क्या मर्दानगी दिखाते हो,
ऐसा करके किसी और की नही, अपनी हस्ती मिटाते हो,
इल्म करो खुदा का, क्या दोगे उसे जवाब

किसी से प्रेम किया तो इज़्ज़त पर बात आ गयी,
जैसे सुनामी मेरे साथ आ गयी,
किसी एक को चाहा तो तो इल्जाम है मुझ पर,
अरे कभी नजरे खुद पर भी डालो ज़नाब

मेरे अंगो का आलिंगन करने वाले,
शौक से गली से गुजरने लगे,
समाजी जुमले मेरी थू थू करने लगे,
एक सवाल मेरे ख्याल में-
कि चंद अंगो में ही इज़्ज़त रहती
शरीर के मायाजाल में,
क्या मेरी सोच का कोई अर्थ नही,
क्या मेरी भावनाओं का कोई मूल्य नही,
क्या बस इतना ही मेरा मोल है,
अगर हाँ तो मेरा जीना है मुहाल

समाज के ठेकेदारो से करती मैं सवाल……आपका अपना आकाश खंगार

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