#Kavita by Alok Trivedi

मानव है कस्तूरी मृग, फिरे है ढूंढे ज्ञान

अपने मन की आत्मशक्ति का इसे नहीं है भान

लगा है दुनिया की खींचतान में खोकर सब सम्मान

चाहे तो पत्थर को हीरा कर दे या मिटा दे नाम-ओ-निशान

लगा है दुनियादारी में रोजी में बेकारी में

बच्चों में और नारी में, रातों की तैयारी में

जेब भरी या खाली है, पल पल यही सवाली है

क्या पायेगा ये सब पाकर, ये है थोथा मान

मानव है कस्तूरी मृग, फिरे है ढूंढे ज्ञान

सोने की एक बाली हो, प्यारी सी घरवाली हो

करे जो तुझसे प्यार, लगता है तू ये सब पाकर हो जायेगा निहाल

जरा सोच क्या तूने दिया अपने देश को या समाज?

ऐसा भी क्या नाम का मतलब करे न कोई ध्यान

मानव है कस्तूरी मृग, फिरे है ढूंढे ज्ञान

अपने मन की आत्मशक्ति का इसे नहीं है भान

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