#Kavita by Anil Abhoojh

दिल्ली से डर लगता है/अनिल अबूझ
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गाँव के एक कोने में बैठा कवि
रचता है शब्दों का संसार
निचोड़ता है दिनोंदिन सूखती जा रही मिट्टी को
नीरता है डांगरों को शब्द
कहता है देहरी भीतर बंधी औरत की कहानियाँ
पढता है खेत की सूखी आँखों के आँक
गढता है जांटी तळे बैठ कोई कविता
ग्वार काटते दोहे
डांगर रूखाळती चौपाईयाँ
कवि कहता है गाँव को संसार
पर कवि
दिल्ली से डरता है
कि दिल्ली
लूट लेगी उसको
मेट्रो की लाईन में खड़ी दिल्ली
चुरा लेगी उसकी कविता
फिर किसी मेट्रो स्टेशन पर ही बिकती दिखेगी उसकी कविता
किसी और का नाम चिपाये
उसकी कहानी चुराकर ले जायेगा
कोई और वाहवाही
दिनरात चिंघाड़ती दिल्ली
भर देगी उसके कानों में बारूद
और खींच लेगी जबान उसके हलक से
कवि से मिलने
कवि के गाम आओ
दिल्ली से डरता है कवि
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