#Kavita by Anita Mishra

चक्रव्युह –
सारा  जीवन ही ही चक्रव्युह ,
टूटती संवेदना मरते विचार,
खोखली मुस्कान , बोझ सी सांसे ,
किसे -किसे भेदोगे
मन बोलो क्या चक्रव्युह
टूटेगा तुमसे ?

सब जगह बाजार है
कीमत लगाते “रिश्तोकी””
प्यार की, जान की
बेमानी सी जीते लोग
मानो किसी पेड़ के
सुखे ठुंठ हो
दे पाओगे उन्हें जीने की
हरियाली
मन बोलो च्क्र्व्युह टूटेगा तुमसे ?

छिनता बचपन – बिगड़ता यौवन
बेसहारा बुढापा ,सिसकते सपने
सब फंसे है एक रेत सी
फिसलती उम्र में
जीवन का पिंजड़l
बंद पाखी रुपी शरीर
मन बोलो  चक्रव्युह टूटेगा तुमसे ?
अनीता मिश्रा “”सिद्धि””हजारीबाग (झारखंड )

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