#Kavita by Anita Mishra

खिलने के पहले मुरझा दिया,
क्युं क्या कसुर था मेरा,
बस अपने लिये छोटा सा खुशी का
पल चाहा,
मैं भी तुम जैसे कुछ जीवन जी लुं,
अपना आसमान
नाप लुं!!
रौदं दिया मेरे जिस्म को,तेरे हवस ने,क्या मिला!!
सोचा तुमने “”दरिन्दों”””
कभी ये कली ही मां,बहन बनेगी तुम्हारी,
घिन सी होती है,
तुम्हे देखकर,जिस आंचल तले पलते हो,
दागदार करते हो!!
मांस ही समझा नारी को जब चाहा,
भूखे हैवान,बहशी,नोचते हो,
कैसे मानु तुम किसी के पिता,भाइ भी हो!!
हाथ थरथाराते नही,
मासूम सी कली को देखकर,
हृदय क्या पाशाण का हो गया,या फिर मुर्दा हो गयी आत्मा!!
कब तक ?अब तो
हमे इंसान मानो,देवी नही महज अपने,
समान मानो!!
दया दृष्टि नही चाहिये,
अपना अधिकार चाहिये!!
मत कुचलो हमे,
कभी भी नारी के प्यार का मोल नहीं चुका सकते,
अब भी संमभलो,
जब हम ही ना होगें तो विनाश क्या करोगे!!
कौन तुम्हे जन्म देगा,किससे प्यार करोगे,
कलाई सुनी रहेगी,ना घर से डोली उठेगी!!
आंगन मे ना पायल छनकेगी,खिलने दो हमे
खुशबु बन बिखरने दो!!
अनिता मिश्रा.हजारीबाग.

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