#Kavita by apramey mishra

गुलाम

कभी कभी लिखना
गुलामी बन जाता है
शब्द सलाखों से चारो तरफ
और भाव दरवाजे पे
ताला नुमा लटक जाता है,
जाने किसकी जेब में
पड़ी है जिंदगी के
व्याकरण की चाभी,
मैं अंदर सलाखों के
जब जब ताकता हूँ
समाज नुमा सीमेंट-ईंट की सी पड़ी छत
आसमान सा फैल जाता हूँ
जहाँ रोज निकलता है सूरज
जहाँ रोज चमकते हैं तारे
मैं देखता हूँ
मैं नहीं भी देखता
वे देखते हैं
वे नहीं भी देखते
मैं चुप हो जाता हूँ
पर वे चुप नहीं होते,
यहाँ गुलाम सा उदास मैं उन्हें बता नहीं सकता
कि वे जो खुश हैं उन्हें ख़ुशी का अहसास नहीं
कि मैं जो यहाँ दुखी हूँ
उसके हेतु का मुझे पता नहीं ।
(अप्रमेय)

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