#Kavita by aprmey mishra

लाठी

एक लाठी
जाने कहाँ से आ गई चित्त पर
पता नहीं,
कोई कैसे बताए उसकी मुठ
वीणा सी झंकृत करती है
ह्रदय के तार,
दुनिया में प्रतीक है लाठी
बूढ़ों के लिए
अपाहिज के लिए
असहाय के लिए,
मैं देखता हूँ
सपनों के बाहर जब भी लाठी
पहाड़ का शिखर
घना-घना जंगल
और जिंदगी के अनगढ़पन
के बीच खड़ी हो जाती है लाठी,
तुम्हे अब तक वैसे ही दिखाई गई लाठी
जैसा वे समझते रहें
पर मैं देखता हूँ इसे
गुलाब, बेला, चमेली
के नीचे जुड़ी हुई
प्रकृति सा खड़ी हुई
आदमी में रीढ़ सा तनी हुई
कुँए के ऊपरी गोलार्ध पर
औंधी लेटी हुई
और विचारों में
कलम सा लिखती हुई
अपौरुषेय है लाठी ।।
(अप्रमेय)

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