#Kavita by Ashok Singh Satyaveer

” कौन करे सच की पहचान? ”

अनपढ़ सोवे चादर तान।

पढ़ा-लिखा कोरा विद्वान।

बलशाली की महिमा जान।

कौन करे सच की पहचान?

अदद वोट की है दरकार।

बन जायेगी फिर सरकार।

नेता के अनुभव का सार।

बढ़ा मनोबल बारम्बार।

जब कुर्सी इतनी आसान-

कौन करे सच की पहचान?

कहीं कभी जब कोई जाग,

भरता जनता में उत्साह।

तानों की सहता बौछार,

क्या लोगे जड़ता की थाह?

चोरों पर जब सच की आन-

कौन करे सच की पहचान?

‘किया हमेशा जनहित काम,

किया देशहितसब बलिदान’

मीठी बातों का औजार।

जनता फँसती बारम्बार।

जब जनता इतनी अज्ञान-

कौन करे सच की पहचान?

अशोक सत्यवीर

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