kavita by Bhanu Prakash Lal Srivastava

स्मृति के झरोखों से

बहुत हमको लुभाते हैं।
कभी मायूस दिखते हैं

कभी वो खिलखिलाते हैं।

हमारी चाह ही

केवल हमारी प्रबल मजबूरी।

कभी तो रूठ जाते हैं

कभी फिर मुस्कुराते हैं।

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